साहित्य, अर्थात जिसमे सभी का हित समाहित हो । क्या साहित्य केवल मनोरंजन का साधन मात्र है ? नहीं ।
साहित्य दर्पण की भांति कार्य करता है, जिसमे समाज का अतीत परिलक्षित होता है । साहित्य एक ऐसी सरिता है जिसमे गोते लगाकर हम तत्कालीन समाज की विचारधारा का पता लगा सकते हैं और वर्तमान समाज को एक नई दिशा की तरफ मोड़ सकते हैं । साहित्य व्यष्टि का नहीं अपितु समष्टि का समर्थक है । समाज ने हमारे पूर्वजो से जो कुछ अर्जित करके हमे दिया और हमसे अर्जित करके जो कुछ हमारी आने बाली पीढ़ी को देगा वही साहित्य है।
साहित्य की भाषा भले ही कोई सी भी रही हो किन्तु इसका उद्देश्य सदैव एक ही रहा है - "सभी का हित करना।" शताब्दियों पूर्व लिखा गया साहित्य तत्कालीन समाज और राष्ट्र की झांकी प्रस्तुत करता है। इतने पूर्व में लिखे गए श्री रामचरितमानस जैसे ग्रन्थ आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, यही साहित्य का लालित्य है और इसी में उसकी सफलता भी ।
साहित्य कभी नया या पुराना नहीं होता है बस परिमार्जित होता रहता है । समाज में होने बाले परिवर्तन के बीज जब साहित्य की उपजाऊ भूमि में पड़ते हैं तो आने बाली पीढ़ी को विरासत के रूप में एक सुदृढ़ विराट वट वृक्ष की भांति प्राप्त होते हैं।
अंत में बस इतना ही कि समाज और साहित्य एक दूसरे के पूरक हैं। जब तक समाज है साहित्य सुरक्षित है, जिस दिन साहित्य नष्ट हो जाएगा समाज का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा ।
धन्यवाद!
_____ राज मोहन पाठक
बहुत सुंदर.....भाई...
ReplyDeleteभइया धन्यवाद🙏♥️
Deleteभइया धन्यवाद🙏♥️
Deleteबढ़िया लेख।
ReplyDeleteआभार आदरणीय
Deleteअच्छा है
ReplyDeleteशुक्रिया
Deleteबहुत,अच्छा लिखा है
ReplyDeleteधन्यवाद बहिनी
Deleteबहुत सुंदर
ReplyDeleteShukriya
Deleteबहुत सुंदर लेख
ReplyDeleteबहुत सुंदर लेख
ReplyDeleteRaj chauhan ji shukriya
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ReplyDeleteवाह !!
ReplyDeleteभैया क्या सच्चाई बयान की है
अति सुन्दर
Shukriya
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